कैलेंडर बदले तो नए साल हो गए : “गोपी”

कैलेंडर बदले तो नए साल हो गए

तारीखें बीतती गई दिन महीने साल हो गए
आया इक्कीस, बीस में कैसे हाल हो गए

चंद अल्फ़ाज़ में हकीकत बयां की तो
देखो गुस्से में सुर्ख उनके गाल हो गए

जोर तो दुश्मन ने लगाया बहुत लेकिन
हथियार ही उनके अब मेरी ढाल हो गए

मुफलिसी में भी चल पड़ी थी जिंदगी
फकीरी में भी हम तो निहाल हो गए

बदलती रहती है तारीख तो हर रोज
जो कैलेंडर बदले तो नए साल हो गए

तुम्हें ग़ज़ल तो कहना नहीं आया “गोपी”
कैसे कह दें तुम शायर बेमिसाल हो गए

रामगोपाल सांखला गोपी

One Response

  1. डी. के. निवातिया 01/01/2021

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