चल देता हूँ मैं – डी के निवातिया

चल देता हूँ मैं

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कुछ लिखता हूँ, और लिखकर चल देता हूँ मैं,
क्रोध में भी मस्ती को भरकर चल देता हूँ मैं !

है पसंद मुझे, सब के साथ घुलना मिलना,
हर शै: में पानी सा मिलकर चल देता हूँ मैं !

कलम के साथ नाता पुराना है शायद मेरा,
तभी तो संग कागज़ बनकर चल देता हूँ मैं !

रोने लगते है खुशियाँ पाकर जब शब्द मेरे,
आंसुओ संग खुद ही बहकर चल देता हूँ मैं !

कोई करता है बातें जब खुद बड़े बड़ाई की,
मान खुद को मूरख, उठकर चल देता हूँ मैं !

मुहब्बत में कुछ इस तरह फ़ना हो गया हूँ,
मेरे यार को पागल कहकर चल देता हूँ मैं !

तंग आ गया हूँ सियासत के हुक्मरानो से,
देखते ही आँखों पट्टी रखकर चल देता हूँ मैं !

जो रखते है इंसानियत के साथ में रिश्ता,
उन्हें प्यार से गले मिलकर चल देता हूँ मैं !!

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डी के निवातिया

2 Comments

  1. satendersingh 22/12/2020
    • डी. के. निवातिया 01/01/2021

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