।। जय पवन कुमार ।।

जय अंजनि कुमार पवन सुत दुःख भंजन है नाम तुम्हारा।
दीन दुःखी असहायों को केवल एक तुम्हारा सहारा।। 1 ।।
जो जन भजते तुमको राम कृपा होती स्वत: प्राप्त।
स्मरण मात्र से तुम्हारे शनि पीड़ा होती है समाप्त।। 2 ।।
नाम लेते ही तुम्हारा भूत- प्रेत जाते हैं भाग।
तुम्हारी कृपा से भक्तों के जग जाते हैं सोए भाग।। 3 ।।
सुग्रीव राम की कराई मैत्री नव परम्परा को दिया जन्म।
मानव वानर की मित्रता से असुर जाति हुई समूल खत्म।। 4 ।।
लंकिनी का कर उद्धार लंका में तुमने रखा पाँव।
अक्षय कुमार कर संहार लंका की छीनी सुख छाँव।। 5 ।।
मेघनाद ने बाँधा राम लखन को नागपाश से किया प्रहार।
गरुड़ जी को लाकर तुमने किया महाविपति से बेड़ा पार।। 6 ।।
वीरघातीनी छोड़ा इंद्रजीत ने हरने को लक्ष्मण के प्राण
संजीवनी लेकर तुम आए लक्ष्मण को तुमने दिया त्राण ।। 7 ।।
प्रभु संग अयोध्या मे विराजे अश्वमेघ यज्ञ कराया संपन्न।
लव कुश के हाथों हुए पराजित नव लीला की तुमने उत्पन्न।। 8 ।।
प्रभु के कृष्णावतार में भी पुन: तुम उनके साथ रहे।
आदेशों का प्रभु के कर पालन तुम पुन: उनके साथ रहे।
अनन्य राममय भक्ति तुम्हारी हृदय विराजें सीताराम।
तुमसे पाकर भक्त प्रेरणा नित प्रति कहते जय श्रीराम।। 9 ।।
इस सेवक की भक्तिहीन भक्ति को करो प्रभु ह्रदय से स्वीकार।
तुम्हारी कृपा से है दुख भंजन मेरा भी हो बेड़ा पार।। 10 ।।
तुम्हारी कृपा रहे भक्तों पर नाविक बन बेड़ा करो पार ।
संकट मोचन बन भक्तों के संकट से करो उद्धार।। , 11 ।।

अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

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