रजनी परी

….गा रहा है चांद रजनी परी…..

किसलय मे डोलता रहा अँचल,
तन पर गहरी स्थिर लहरें चंचल
प्रेम की रुनक झुनक सी नाद …
करती हैं संवाद मन विभावरी ,
रात श्यामल शीतलता भरी,
गा रहा है चांद रजनी परी …!!

तेरा तम ही तो है जीवन
नित सुबह मुखर स्पन्दन
जिसमे जीता रहा मैं जलकर
आभास नए सुख का देती
अंतर में जैसे पीर घनी भरी,
गा रहा है चांद रजनी परी…..

तन चिर परिचित श्याम वर्ण
जिसमें कुछ और नहीं रचता
तुझमें ही है मिटने का साहस
तुझको कुछ और नहीं जंचता
तेरे तम से खुद को धोकर
तुझसे सजकर सूरज उगता
और तू खुद अंधियारी भरी
गा रहा है चांद रजनी परी…..

तू प्रेरक, चातक, सौम्य, शांत
फिर भी सदियाँ से खड़ी एकांत
जग तुझमें पाता चित् आराम
हारे, जीते, सब विकल, क्लांत
है समय समर्पण की मौन घडी़
निस्वार्थ भावः से तुझमे पूर्ण भरी
गा रहा है चांद रजनी परी…..

कपिल जैन

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