हर रोज सोचता हूं

 

मै हर रोज सोचता हूं के नहीं लिखूंगा उसे अपनी शायरी में।
हटा दूंगा उसे दिमाग से अपने।
मिटा दूंगा उसे ख्यालों से अपने।
मै अपने कलम कि स्याही से उसे कागज पर नहीं उतरने दूंगा।
मगर लफ्ज़ दर लफ्ज़ हवा के रस्ते होले होले वो कागज़ पर उतरती जाती है।
जितनी भुलाने की कोशिश करता हूं उसे।
वो उतना ही याद आती है।

यूं तो कई मर्तबा कोशिश की है मैंने वो कागज जलाने की।
उसकी यादों को राख बनाने की
जला दिए मैंने वो सब खत जो उसके लिए लिखे थे कभी।
अब उसी राख में उसका प्यार ढूंढता हूं।
चाहता हूं के ना लिखूं उसे, ना नाम लूं उसका।
पर उसके बगैर,
मै खुद के होने पर ही सवाल पूछता हूं।

मै हर रोज सोचता हूं, बस बहोत हुआ अब और नहीं।
उसका ज़िक्र अब कल नहीं होगा।
सो जला देता हूं नंबर उसका।
मिटा देता हूं तस्वीर उसकी।
मिटता जाता हूं वो हर चीज जो उसकी याद दिलाती है।
मगर मै बेबस,
उसके नाम की आवाज तो यहां मेरे दिल से आती है।

लगता है उसकी यादें मिटाने को
मुझे खुद को ही मिटाना होगा।

मै हर रोज सोचता हूं, के नहीं लिखूंगा अब कभी भी उसको
पर उसके बगैर।
मै खुद को होने पर ही सवाल पूछता हूं।
उसकी यादों की राख में, अपनी ज़िन्दगी ढूंढता हूं।
मै हर रोज सोचता हूं………

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