पिछली सीट

 

 

चिलचिलाती धूप में गाजियाबाद के ट्रैफिक जाम में लगभग 1 घंटे से ज्यादा खड़े होने के बावजूद मेरे माथे पर कोई शिकन या कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि आज वो मेरे साथ थीं। यह वही थीं जो अब तक मेरे साथ कहीं देखे जाने पर भी असहज हुआ करती थीं और बमुश्किल ही इस बात को स्वीकार कर पाती थीं कि हम एक दूसरे के साथ हैं लेकिन आज वो मेरे साथ मेरी स्कूटी की पिछली सीट पर बैठी हुई थीं। ऐसा नहीं था कि वह पहली या आखिरी हैं जो उस जगह पर हैं मगर उनके साथ होने का एहसास सबसे जुदा था। यकीन मानिए कि मैं धूप में इतना शांत, चेहरे पर मुस्कुराहट लिए इससे पहले कभी भी खड़ा नहीं हुआ था ।उनसे बातें करते हुए वह वक्त न जाने कब बीत गया इसका ना उन्हें पता था ना मुझे अंदाजा था और ना ही ख्वाहिश थी कि जाम खुल जाए। असली आनंद केवल रास्ते में होता है मंजिल पर पहुंचने के बाद तो अक्सर बिछड़ जाते हैं और इसी बात का एहसास मुझे वहां से ना हिलने के लिए प्रेरित कर रहा था। वो, उन्हें में क्या वर्णित करूं वह स्वयं एक कल्पना से परे और विचित्र चरित्र की स्वामी हैं। लगभग 5 फुट 2 इंच की लंबाई, सुडौल कसा हुआ शरीर, गोरा रंग , गालों पर लटकी हुई जुल्फें, ढेर सारे सवाल पूछती हुई उनकी आंखें, कश्मीरी सेब से उनके लाल गाल और गुलाब की पंखुड़ी जैसे उनके होंठ, चेहरे की बनावट ऐसी जैसे स्वयं स्वर्ग लोक से अप्सरा उतर आई हो। उनके छोटे छोटे पैर जिनसे अक्सर वो तेज चलने कोशिश किया करती थीं और छोटे छोटे हाथ जिनसे वो मुझे हसी मजाक में मारती थीं। वो वक्त ऐसा था जिसको थाम लेने इच्छा मन में होती थी।

 

अमूमन वो अपना सफर मेरे साथ ही तय किया करती थीं चाहे फिर वो पैदल चलना हो, रिक्शे से जाना हो, कम से कम पिछले 10 महीने से तो वो मेरे साथ ही आया जाया करती थीं, जिसमे यह दूसरी बार था कि वो मेरे साथ मेरी स्कूटी की पिछली सीट पर एक उचित दूरी तय करने की कोशिश करते हुए, अपने हाथ मेरे कंधे पर रख कर, मेरी कही बात सुनने के लिए आगे की ओर झुका हुआ उनका शरीर और मेरे कान के पास उनका चेहरा लाए हुए ढेर सारी बाते करती हुई सफर में मेरे साथ थीं। हम अक्सर यूं ही बात करते हुए जाते थे। वो वक्त, वो एहसास सब कुछ पहले से जुदा था। ऐसे तो मेरे साथ पहले भी कई बार पीछे बहुत से लोग बैठ चुके थे मगर ये एहसास अलग थे। जहां कहीं अचानक से ब्रेक लगता तो वो भी साथ साथ मेरे कंधों को दबाती जाती, मानो उनके हाथ में मेरे कंधे ना हो स्कूटी के ब्रेक हों। हर ब्रेकर से गुजरने पर या ब्रेक लगने पर वो मेरे करीब आती जाती, उनसे आती हुई महक एक तरह का नशा कर देती थी, जिसके असर में धूप, गरमी सब अच्छा लगने लगता था। स्कूटी जब भी थोड़ा तेज चलती तो वो थोड़े से खफा होकर नखरीले अंदाज में बोलती – ” हा तू उड़ा ले इसे, क्या जल्दी है तुझे घर जाने की धीरे धीरे चला ले”। कभी कभी हम दोनों ही बिल्कुल चुप रहते और इंतजार करते की बात करने की शुरुआत कौन करेगा, इस पर वो कहती – ” तू भला क्यों बात करेगा, तुझे स्कूटी तेज चलाने से फुर्सत नहीं है, धीरे कर ले इसे नहीं तो पिट जाएगा” । कई बार तो हम इतने धीरे चलते थे कि साइकिल वाला भी हमसे आगे निकल जाता था । ना जाने किसकी तरह मगर जब वो मेरे पीछे बैठे होते थे तो बिना किसी सवाल के मेरा फोन, पर्स या जो भी मै दे दिया करता था उसे संभाल कर रखती थीं, और मै भी पूरे हक़ के साथ उन्हें अपना सामान देता और लेता था। रिश्ते का नाम तो नहीं था मगर हक़ और प्यार पूरा जताते थे हम एक दूसरे पर।

 

आज आखिर वो दिन भी आ ही गया जब वो आखिरी बार मेरी हमराही बनकर पिछली सीट पर बैठने वाली थीं, शायद इस दिन के बाद मै कभी भी उनसे और वो मुझसे नहीं मिलने वाले थे । 28 सितम्बर का दिन था, हम दोनों गाजियाबाद से वापस आ रहे थे, आज भी वो मेरी स्कूटी की पिछली सीट पर बैठी हुई थीं, हम दोनों ही आज चुप थे शायद आगे जो होने वाला था उसका हम दोनों को एहसास था। बहुत देर इंतजार करने के बाद वो बोलीं – ” पूरी एकाग्रता के साथ चला रहा है क्या आज , जो बिल्कुल चुप है, बात नहीं करनी क्या” । मैंने कहा – ” नहीं ऐसा कुछ नहीं है, बस ये समझ नहीं आ रहा की क्या बात करू”। उन्होंने कहा -” रोज तो इतना बोलता है, अब कहां गई तेरी सारी बातें, चल छोड़ मै ही बता देती हूं तुझे कुछ”। उस दिन उन्होंने कुछ ऐसा बताया जिसकी उम्मीद तो नहीं थी, जिसके बाद सब कुछ कहानी सा लग रहा था। मेरे जहन में सवाल तो बहोत सारे थे, मगर मेरी जुबां से वो निकल ही नहीं रहे थे, मै स्तब्ध था या यूं कहूं मै शून्य में था। इसके बाद मैंने उनसे ना कोई सवाल किया ना कोई जवाब मांगा, मै बिल्कुल खामोश था और उनकी सारी बाते सुन रहा था। अब बस मै उनकी महक, उनकी आवाज को , उनके एहसास को अपने जहन में समेट लेना चाहता था, शायद आज ये आखिरी बार था जो कि वो मेरे साथ पिछली सीट पर थे इस दिन के बाद मैंने उनसे ना मिलने का मन बना लिया था। कुछ ही देर में हम वहीं पहुंच चुके थे जहां अक्सर मै उन्हें छोड़ा करता था। मै आज आखिरी मुलाकात के लिए उनके लिए एक उपहार लाया था, मैंने वो उन्हें दिया और खामोशी से स्कूटी पर बैठ गया। वो अब घर जाने लगे थे, मै आज भी उन्हें एकटक देख रहा था, दिल बहोत जोरों से धड़क रहा था, जी चाहता था कि रोक लूं उन्हें मगर अब रोकने की ताकत मुझमें बची नहीं थी। नहीं मालूम की उनका क्या हाल था मगर वो गर्दन झुकाए चले जा रहे थे, उन्होंने एक बार पीछे मूड कर देखा तो था , पर हम दोनों एक दूसरे से नज़रें मिला ही नहीं पाए। कुछ ही देर में वो मेरी आंखों से ओझल हो चुके थे और मेरी स्कूटी की पिछली सीट खाली थी, जिस पर उनके अभी भी बैठे होने का मुझे एहसास हो रहा था। जब भी कहीं जाता हूं तो लगता है की वो पीछे बैठे हुए हैं, लगता है कि पीछे से अभी कान के पास आकर वो कुछ बोलेंगे, मगर अब सब ख़तम हो चुका है। पिछली सीट की ये कहानी शायद यहीं तक मंजूर थी किस्मत को।

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