दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)

दोहे

आई देखो दामिनी, चंदा लेकर साथ
दिनकर भी मद्धिम पड़ा, अद्भुत है सौगात।

नखत भी अब चमक रहा, जगमग है आकाश
घूंघट के पट खोलकर, करता है अट्टहास।

हंसने लगी चाँदनी , रूप सलोना देख
नील गगन पुलकित हुआ, ये विधना का लेख।

निश्छल निशा निहारती, अद्भुत रूप अनूप
नयनन में सरगम बसा, चांँद बन गया भूप।

मिलन घड़ी है प्रेम की, शीतल मंद बयार
जैसे बाहों में लिया, मृगनयनी को यार।

महक बिखेरें हैं चमन, सुगंधित पुष्प राज
रात रानी मचल गई, मुग्ध हुए हमराज।

प्यारी प्रियतम बोल कर, खोल रही मन द्वार
दिल में दिल का प्यार है, मिलते नर से नार।

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