।। निराश की आस।।

हे जगतपिता ! हे जगदीश्वर ! नित प्रति जपूँ तुम्हारा नाम।
भक्ति मे मेरी शक्ति नहीं, किस विधि तुमको करूँ प्रणाम ।। 1 ।।
बचपन बीता बचपना करते, अंजाने युवावस्था आई।
जीवन बीता मौज उड़ाते, किंतु तुम्हारी याद न आई ।। 2 ।।
ढलती उमर में आकर आज, जब शरीर ने छोड़ा साथ।
तब मैं चला स्वार्थी बनकर, पकड़ने को अब तुम्हारा हाथ ।। 3 ।।
किस विधि विनती करूँ मैं तुमसे, हे दीन हीन अनाथों के नाथ।
मुझे सहारा केवल तुमसे, तुम ना छोड़ो मेरा साथ ।। 4 ।।
सुना है भगवन आर्त पुकार पर, तुम लगे पाँव भागे आते हो।
असहायों का सहारा बनकर, डूबती नैय्या पार लगाते हो ।। 5 ।।
इसी विश्वास के सहारे, शरण तुम्हारी आया हूँ।
भले ही हूँ मैं निपट स्वार्थी, पर द्वार तुम्हारे आया हूँ ।। 6 ।।
शरणागत को शरण मे लेकर, भगवन! बेड़ा पार करो।
धन – सम्पति की है चाह नहीं, अपने भक्त का उद्धार करो ।। 7 ।।
नहीं चाहिए कि यह दुनिया मुझको यश और मान दे।
केवल कृपा तुम्हारी मुझको, नित प्रति नूतन भक्ति का वरदान दे ।। 8 ।।
याचक बनकर द्वार तुम्हारे, आया हूँ जग के स्वामी।
दया भाव से अपनाकर, दूर करो जीवन की नाकामी ।। 9 ।।
पार्थ समान नहीं भक्ति मेरी, किस विधि शरण तुम्हारी गहूँ।
अधम समझ कर ही अपना लो, भक्ति में तुम्हारी मगन रहूँ ।। 10 ।।
अगणित अधम तारे है तुमने, आज मेरी भी बारी है।
सब कुछ त्याग दिया है मैंने, केवल आस तुम्हारी है ।। 11 ।।
असहायों के हे भगवन! तुम ही एक आधार हो।
जिनको केवल आस तुम्हारी, तुम उनके तारनहार हो ।। 12 ।।

अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

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  1. Vivek Singh 25/11/2020

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