मुक्तक, दौहे और रचनाएं – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)

मुक्तक

जिसे हंसना था, तूने रुला दिया
खुशियाँ दे न सके गम में सुला दिया।
उजाड़ दी ज़िन्दगी भला चंगा था
इक पल में अपना रिश्ता भुला दिया।

नफ़रत

नफ़रत! नफ़रत! नफ़रत! और करें कितना नफ़रत
बचा कुछ नही भाई! यहाँ कर रहे सब इशरत।

वाह रे भैया – बाबू! वाह रे इनकी दुनिया
लोग लगे अपनी धुन में करते ऐसी हरकत।

सिसकियों में गुजर रहा इंसान की ज़िन्दगी
लाचार – बेबस का कोई नहीं करता ख़िदमत।

बहुरुपियों को मत पूछो उनकी रज़ा क्या है
लेकर वो अवतरित हो गये कलियुगी किस्मत।

ईमान की बात कौन करे राजनीति में आकर
गली, चौक – चौराहे पर रही कहाँ वो हसरत।

लालच, ईष्र्या में फंसकर भूले रिश्ते – नाते
इस फरेबी दुनिया में रह गई बेतुकी ग़फ़लत।

मीठी – मीठी बातें करते लगते जैसे अपने
जिसके दिल चोट लगी है उनकी देखो फ़ितरत।
दोहे

दसो दिशा में घूमता, नहीं कहीं भी ठांव
चंदा – सूरज देख लो, तनिक नहीं ठहराव।

थकते, घबराते नहीं, ये ग्रहों के काल
धरा हमारी बोलती, रखना अपना ख्याल।

खेले जो भू खण्ड से, झेलोगे खुद आप
मनमानी करना नहीं, बढ़ जायेगा ताप।

लोग लगे हैं रात – दिन, दुश्मन बने हजार
करनी का फल भोगना, लटके जब तलवार।

सौंप दिया था सोच के, अपना प्यार – दुलार
मनुज हो कर भूल रहे, क्यों अपना सत्कार।

प्रदुषित हुआ पर्यावरण, शैल विपिन नद ताल
कौन बचाएगा तुझे, आ जाए जब काल।

असंतुलित बसुधा हुई, बिगड़ा इनका रूप
सँभल नहीं पाए अगर बना, देगा कुरूप।
दोहे

दसो दिशा में घूमता, नहीं कहीं भी ठांव
चंदा – सूरज देख लो, तनिक नहीं ठहराव।

थकते, घबराते नहीं, ये ग्रहों के काल
धरा हमारी बोलती, रखना अपना ख्याल।

खेले जो भू खण्ड से, झेलोगे खुद आप
मनमानी करना नहीं, बढ़ जायेगा ताप।

लोग लगे हैं रात – दिन, दुश्मन बने हजार
करनी का फल भोगना, लटके जब तलवार।

सौंप दिया था सोच के, अपना प्यार – दुलार
मनुज हो कर भूल रहे, क्यों अपना सत्कार।

प्रदुषित हुआ पर्यावरण, शैल विपिन नद ताल
कौन बचाएगा तुझे, आ जाए जब काल।

असंतुलित बसुधा हुई, बिगड़ा इनका रूप
सँभल नहीं पाए अगर, बना देगा कुरूप।
धीरे-धीरे

दौड़ेगा तो थक जायेगा, धीरे – धीरे चल
चलना ही तो जीवन है यह, दीपों सा तू जल।

ठोकर भी गर लगे तुझे तो, तुम मत घबराना
उठकर तुरत खड़े हो जाना, है मंज़िल पाना।
चाहे जितना संकट आए, जायेगा सब टल
चलना ही तो जीवन है यह, दीपों सा तू जल।।

हम भी तो हैं साथ तुम्हारे, डटे रहो पथ पर
हुजूम सा यह निकल पड़ा है, एक खड़ा रथ पर।
विजय होगी सत्य की भैया, आयेगा वो पल
चलना ही तो जीवन है यह, दीपों सा तू जल।।

झूठों का मुँह काला होता, है अंजाम यही
दानव से मानव बन जाओ, है पैगाम यही।
भटक गये इधर उधर तुम, ढ़ूढ़ो अपना हल
चलना ही तो जीवन है यह, दीपों सा तू जल।।

बदनामी से डरकर रहना, बन प्रेम पुजारी
मदद हमेशा मिलकर करना, रहे न दुखयारी।
सादा जीवन फिर से लाओ, रहे न मन में छल
चलना ही तो जीवन है यह, दीपों सा तू जल।।
दोहा

फिर सीता वनवास में, क्यों भेजे श्री राम
दिल पर पत्थर बाँधके, प्रिय को किए प्रणाम।

कुण्डली

भूप राम को जानिए, हैं दशरथ के लाल
सीता जी वन को गई, राम हुए बेहाल।
राम हुए बेहाल, अवध में रोते सब थे
एक रजक की बात, से हो गए थे वश में।
ये मर्यादित कर्तव्य, धर्मो के है अनुरूप
प्रजा के लिए न्याय, अवतारी करते भूप।

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  1. Vivek Singh 25/11/2020

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