सार छंद – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – (बिन्दु)

पत्थर पर भी दूभ उगेगा
सार छंद – 16+१२ अंत 22

बहुत आगे बढ़ गई दुनिया, तुम देखो हम कितने
तुम भी आगे बढ़ सकते हो, रोका तुमको किसने।

तुम छू सकते नील गगन के, चमके चाँद सितारे
हिमालय के शीश चढ़ सकते, बल है तुममें इतने।

मुट्ठी में भर सकते दुनिया, हूनर इतना जानों
तुम तो बस इतना ही जानो, फूलों जैसे खिलने।

ज्ञान बिन संभव नहीं कुछ भी,चाहे जितना भागो
हीरे में भी चमक तभी है जब पड़ते हैं धिसने।

कुछ भी संभव हो सकता है,अगर लगन है दिल में
पत्थर पर भी दूभ उगेगा, ठान लिया जो तुमने।

भरोसा खुद विश्वास किया जो, हरदम उसने जीता
पा लेते हैं मंज़िल अपनी, कर्म किया है जिसने।

मुंह में राम बगल में छुरा, मीठी बातें करते
पर कुछ साथी अब ऐसे में, लग जाते हैं बिकने।

काम-क्रोध पर विजय पताखा,आज”बिन्दु”लहरा दो
जुल्मों को अब खत्म करें हम, बने न इतने ठिगने।

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