सीख रहा हूँ – डी के निवातिया

सीख रहा हूँ
***

कलम लिए झूल रहा हूँ,
मैं लिखना भूल रहा हूँ,
क्योकि,
अब पढ़ना सीख रहा हूँ
!
गीत ग़ज़ल कविता दोहे,
कभी समझ आये मोहे,
उनसे अब जूझ रहा हूँ,
इसलिए,
अब पढ़ना सीख रहा हूँ
!
रास छंद अलंकारो में
काव्य की रसधारो में
काव्य शैली ढूंढ रहा हूँ
अतएव,
अब पढ़ना सीख रहा हूँ ।।
!
भिन्न भेद लिपटे हुए
स्वरूप में सिमटे हुए,
काव्य भेद बूझ रहा हूँ
कारण,
अब पढ़ना सीख रहा हूँ ।।
!
डी के निवातिया !!

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