रूह का लिबास – डी के निवातिया

रूह का लिबास
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साँसों की गर्म हवा बर्फ सी जमने लगे,
लबों से हर्फ़ जर्जर पेड़ से हिलने लगे,
रूह ! तुम लिबास बदल लेना उस रोज़,
जिस दिन, जिस्म बोझिल लगने लगे !!
!
डी के निवातिया

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