यादें

यादें तेरे सुलूक की डसती हैं आज भी
मिलने की आरजू में तरसती हैं आज भी
आँखे लाख बंद करने के बावजूद
रह रहकर के बरसती हैं आज भी

आती है जब याद तेरे नशीले नैनों की
सजल होकर मग्न भिगोती हैं आज भी
लौट गये तुम यूँ बिना ये परवाह किए
तेरी आरजू में रातें रोती हैं आज भी

कैसे टाल देता मैं ख्वाइशें उस चेहरे की
जिसे देखकर सुबह होती हैं आज भी
इतनी सी बात पर खो दिया जिसे हमने
हर कूचे में आरज़ूऐं उसे ढूँढती हैं आज भी

राकेश कुमार
महेन्द्रगढ, हरियाणा
मोबाइल 6005479067

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