फ़लसफां

इक नहीं आप ही तनहा ये ग़म उठाते हैं
कितने परवाने हैं जो इसमें जले जाते हैं

रस्म-ए-उल्फ़त की निभाना नहीं आसां इतना
उम्र हम अहद-ए-वफ़ा पर गुज़ारे जाते हैं

हमने तो ज़िक्र चांदनी का किया था यूँ ही
क्या हुआ आप हमें देख क्यूँ शरमाते हैं

उनको तनक़ीद से मेरी अभी फुर्सत ही नहीं
और ज़माने में हमें लोग सर बिठाते हैं

उसने जो ख़तम कर लिया है मरासिम हमसे
फिर भी लहज़े में उसके हम क्यूँ नज़र आते हैं

ज़िन्दगी की तो यहाँ कोई क़दर है ही नहीं
और मज़ारों पे तो हम चादरे चढ़ाते हैं

 

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 08/10/2020
    • Dr. Nitin Kumar pandey Nitin Pandey 11/10/2020

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