इच्छा ये तुम्हारी है

इच्छा ये तुम्हारी है
देखो सब उजड़ते हुए
फूल पत्ते पेड़ झड़ते हुए
या नए पुष्प खिलते हुए
उनपर भौंरे उड़ते हुए
इच्छा ये तुम्हारी है ॥ १ ॥


है मुर्दा हर इंसान ज़िंदा होते हुए
काल के जाल से ज़िन्दगी निचोड़ते हुए
फिर भी समेटने की चाह इतनी है
जैसे मरकर संपत्ति वही मिलनी है
जब अपना कुछ कभी था ही नहीं
तो आंसू क्यों बहाना अपना कुछ खोते हुए
कुछ है तेरा तो ये कुदरत है
जिसके लिए फुर्सत नहीं
मरकर भी ज़िंदा, तू किसी पेड़ में हो
या मुर्दा सा पड़ा, किसीकी जेब में नहीं
पेड़ जियें बरसों, वहीँ पैसे के लिए तरसो
अपने पीछे छोड़ना क्या है? ये अपनी समझदारी है
वरना रहो मौन, भोगो सब, और देखो सब उजड़ते हुए
इच्छा ये तुम्हारी है ॥ २ ॥


ज़िंदगी है, यूँही चलती चली जाएगी
वीराने में कहीं कोई कली खिल जाएगी
फिर चल देना उसे भी तोड़ने के लिए
कतरा कतरा इस कुदरत का, बटोरने बस अपने लिए
ज़रूरत है अपनी ज़रूरतों को समझने की
वक़्त रहते अपनी हरकतों को संवारने की
काल कब रुका था किसी राजा या रंक के लिए
कुदरत भी नहीं बनी, महज मेरे या तेरे लिए
वक़्त के साथ एक दिन कुदरत बदल जाएगी
खिल रही जहाँ कली वहां कल मौत मंडराएगी
इसलिए ये हमारी जिम्मेवारी है कि समझें
कैसे हर जीव की अपनी एक हिस्सेदारी है
क्यों फूलों पर काँटों की सख्त पहरेदारी है
बस लें खुशबू हम अपने हिस्से की
और देखें फूल को किसी भौंरे का होते हुए
वरना देखो सब उजड़ते हुए
कोमल कली को काले केशों पर खिलते हुए
इच्छा ये तुम्हारी है ॥ ३ ॥


 – नितिन परिहार ‘राजा’

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