अनकही

1
कभी खिड़की में सजाऊँ तुम्हें
एक ललाट की बिंदी लगती हो
बहुत सरल सहज हो तुम
मुझे हर रूप में हिन्दी लगती हो

2
बात ये नहीं की खूबसूरत है तू
बात ये भी नहीं की जरूरत है तू
बात बस इतनी सी है भोले सनम
मेरे हर ख्वाब की मूरत है तू

3

बात तुमसे चाहत की होती तो मान लेते हम
तुमको हर बार खुदा से दुआओं में माँग लेते हम
पर फिदरत तेरी राजदार रही मेरे अफसानो से
काश तेरी आँखों को पढना थोड़ा सा जान लेते हम

4
अब तो छोड़ दे
मतलब की बातें
हम तेरे बिना
बेतलबी हो गये

5
ये मेरी धड़कन और तेरी आहट
एक ही तो है
ये प्यासा सावन और चित्त की तड़पन
एक ही तो है
कागजी कहानियाँ और तेरी निशानियाँ
एक ही तो है
तेरा पलकें झुकाना और भरा मयखाना
एक ही तो है
तेरी जुल्फों का गिरना और मदमस्त झरना
एक ही तो है
जुगनुओं चमकना और तेरा चहकना
एक ही तो है
दबा खजाना और तेरा मुस्कुराना
एक ही तो है

6
मैं लिख दूँ जो तेरे दिल में गुमनाम है
आरजूऐं तेरी जो मेरे बिन परेशान है
मुस्कराते हैं बस तुझे सोचकर
हसरतों को जानना कहाँ आसान है

7
अक्सर तुझे ढूँढते हुऐ रात हो जाती है
किताबों में ही तुझसे बात हो पाती है
जब भी पलटता हूँ पन्ने गुजरे वक्त के
हर पन्ने पर तुझसे मुलाकात हो जाती है

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