दोहे

प्रेम भाव एवं भावना, बहते जैसे मेघ
जो पहचाने हृदय को ,वो जाने सब भेद

प्रेम उत्तम विशाल है, कैसे जाने ठोर
सिर्फ लालसा की गढरी ,बांधे फिरते ढोर

जो कोई मुझसा मिले, तो मैं मिलाउंँ नैन
प्रेम ही रूप त्याग का, बिन पाये भी चैन

प्रेम देना ही जानता ,ना माँगे कुछ मोल
जहाँ माँगने से मिले, कहाँ का प्रेम बोल

स्वरचित मौलिक दोहे।

राकेश कुमार

Leave a Reply