मै जज्बात लिखती हू

अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू

जिन शहरो में मोहब्बत जिस्म पर,
आकर ख़त्म हो जाती है ,
ऐसे शहरो को मै बेईमान लिखती हू !
अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू

जुबान से निकले दर्द ,कोई समझे न ,
फिर वो अपने अंदर भी  छुपे न ,
ऐसे दर्द को मै बेकार लिखती हू
अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू

आजमाइशों के इस दौर में ,
कहीं खोते गए मायने अपने ,
ऐसे दौर को मै तार तार लिखती हू!
अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू

ये वक्त हर पल उलझता है ,
क्यों सब कुछ नहीं सुलझता है ,
एक दिन सब कुछ
 सुलझा सा ही लगेगा ,
उस पल का मै इंतजार लिखती  हू!!
अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू

बोलियां लगा कर हँसी ,
खरीदने लगे है लोग ,
जो बिना बोले ही लुटा दे खुशिया ,
उस जुबान को ही
बोलने का हक़दार लिखती हू  !!
अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू

हो किसी के माथे की काली बिंदी ,
या हो चमकता नूर,
जो किसी की सादगी पर आकर टिक जाये ,
उस शक्शियत का दीदार लिखती हू!!
अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू

खूबियों से भरे  ये चेहरे ,
इतराते बहुत है ,
मै तो कोरे कागज पर भी,
खामिया बेसुमार लिखती हू !
अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू

जमाना पायल को छोड़ ,
काले धागे से दिललगी कर बैठा हैं ,
आज भी हर आंगन की जरूरत ,
मै पायल की झंकार लिखती हु

अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू
बात बात पर उठते यहाँ तमाशे ,
हर बार सिसकती वही आहटें ,
खत्म ही नहीं होता,
 ऐसे सिलसिलो का दौर 
फिर भी मै मश्वरे हज़ार लिखती हू!
अल्फाज नहीं, मै जज्बात लिखती हू
दिल से निकली वो हर बात लिखती हू

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