स्वप्न

रात के शहर में,
नींद की गली से गुजरते हुए,
पलकों की चौखट पर,
हलके से आ बैठता है,
यूँ स्वप्न जनम लेता है।

कभी लोरी सा सुलाता है,
काली रात सा डराता है।
कहानी सा चलता है,
शीशे सा टूटता है ।
खयालों में पनपता है,
हक़ीक़त से छिपता है।

बिन-बुलाए मेहमान सा,
अनंत-असीम तान सा।
घोड़े पे सवार सुलतान सा,
बहस में खींचतान सा।
बिगड़ी हुयी संतान सा,
कमान से निकले बाण सा।

रात के शहर में,
नींद की गली से गुजरते हुए,
पलकों की चौखट पर,
हलके से आ बैठता है,
यूँ स्वप्न जनम लेता है।

6 Comments

  1. ANJALI YADAV 27/08/2020
    • Garima Mishra 23/01/2021
  2. Ashraf 01/09/2020
    • Garima Mishra 23/01/2021
  3. D Seetharam 01/02/2021
    • Garima Mishra 02/02/2021

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