ग़ज़ल (बुझी आग फिर से जलाने लगे हैंं)

ग़ज़ल (बुझी आग फिर से जलाने लगे हैंं)

बह्र :- 122*4

बुझी आग फिर से जलाने लगे हैं,
वे फितरत पुरानी दिखाने लगे हैं।

गुलों से नवाजा सदा जिनको हम ने,
वे पत्थर से बदला चुकाने लगे हैं।

जबाब_उन की हिम्मत लगी जब से देने,
वे चूहों से हमको डराने लगे हैं।

दुनाली का बदला मिला तोप से जब,
तभी होश उनके ठिकाने लगे हैं।

मजा आ रहा देख अब उनको यारो,
जो खा मुंह की तिलमिलाने लगे हैं।

मिली चोट ऐसी भुलाये न भूले,
हकी़क़त वे इसकी छिपाने लगे हैं।

‘नमन’ बाज़ आयें वे हरक़त से ओछी,
जो भारत पे आँखें गड़ाने लगे हैं।

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
तिनसुकिया
30-06-20

6 Comments

  1. Dr.M.C. Gupta 20/07/2020
    • Basudeo Agarwal Basudeo Agarwal 21/07/2020
  2. vijaykr811 vijaykr811 20/07/2020
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/07/2020
    • Basudeo Agarwal Basudeo Agarwal 21/07/2020

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