पलायन

कहीं रात के सन्नाटे में,
तो कहीं तपती दोपहरी में,
मोहल्ले, कूचे, गलियों में,
कुछ क़दमों ने शहर छोड़ा है।
बस्तियों से दूर, बहुत दूर,
उजड़ी, वीरान सड़कों पर,
कुछ साँसों ने दम तोडा है।

साफ नजर आ रहा था,
हर जख्म हर निशान,
बेनकाब, बेपरदा,
दिखती थी हर दासतां ।

जेब में दो सौ के नोट पड़े थे
कंधे पे मायूसी की गठरी बाँधी थी,
पाँव में कुछ दर्द के छाले,
डब्बे में रोटी आधी थी।
कहीं बेबसी थी रो रही,
कहीं भुखमरी बिलख रही,
घर-गांव पहुँचने के लोभ में,
लाचारी चलती रही ।

शहरों के बाशिंदों ने
इनको किस्मत पे छोड़ा है,
उजड़ी, वीरान सड़कों पर,
कुछ साँसों ने दम तोड़ा है।

10 Comments

  1. vijaykr811 vijaykr811 14/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 14/07/2020
  2. Shilpa Kulkarni 14/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 14/07/2020
  3. subash 17/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 18/07/2020
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 29/07/2020
  5. Ashraf 22/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 29/07/2020

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