रसोई

दोपहर के करीब साढ़े तीन बजे,
रसोई से कुछ आवाज़ें कानों में पड़ी ।
मानो कुछ लोग बातें कर रहे थे,
गौर से सुनने पर मालूम हुआ,
बर्तन आपस में बतिया रहे थे ।

कर्छुली कढ़ाई से कह रही थी,
आजकल मेमसाहब रसोई में ही नज़र आती है,
घंटों गैस के चूल्हे के साथ बिताती है ।
एक भगोना गंजिया के कानों में फुसफुसाया,
‘ज़्यादा कुछ नहीं जानती है
सब मोबाइल पे देखकर पकाती है ।

छन्नी तभी तपाक से बोली,
‘कई बार साहब आधी रात रसोई मैं आते हैं,
कुछ कच्चा-पक्का बनाकर खाते हैं’ ।
‘इनके पकवानों में पुराने रसोईये सा दम नहीं
मेमसाहब को कहते सुना है,
“खाना बनाना मैडिटेशन से कम नहीं ।
गिलास बोली ‘कुछ नन्हे-मुन्ने हाथ भी
अब हर रोज़ रसोई में नज़र आते हैं,
कभी खीरा तो कभी आलू छीलते पाए जाते हैं ‘।

ठहाकों की गूँज उठी चम्मचों-कटोरियों के बीच,
बातों-बातों में एक-दूसरे की टांग रहे थे खींच ।
कटोरी इठला कर बोली,
‘मैं आजकल रोज़ नए व्यंजन परोसती हूँ’
चम्मच बोली ‘पर मुँह तक तो मैं ही ले जाती हूँ’ ।

तू-तू मैं-मैं का ये सिलसिला
रसोई में घंटों जारी रहा,
कभी कोई तो कभी कोई दूजे पे भारी रहा ।
तभी एक तेज सीटी से,
कुकर ने सभी को शांत किया
तना-तनी के माहौल को जैसे-तैसे अंत किया ।

8 Comments

  1. vijaykr811 vijaykr811 14/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 14/07/2020
  2. Shilpa Kulkarni 14/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 14/07/2020
  3. subash 17/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 18/07/2020
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 29/07/2020

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