कमली

गांव के कुए से कुछ कदम आगे, बूढ़े बरगद के पीछे,
कमली की झोपडी और झोपडी में जलती लालटेन ।
गुजरते पहर के साथ लालटेन की रौशनी कम होती रही,
रात के सन्नाटे में वो अपनी ही साँसे सुनती रही ।

थाली में परोसी रोटी कुछ कच्ची कुछ पक्की थी,
उस रात कमली ने पलक न झपकी थी ।
एक निवाला उसके हलक से न उतरा था,
बीता हर लम्हा उसकी नज़रों से गुज़रा था ।

‘सूरज ढलते आ जाऊंगा’ कहकर निकला था भोला
न भोला आया, न ही उसका संदेसा ।
रात स्याही सी काली, और काली हो रही थी,
कमली सिसकियों में अपने आंसूं पोछ रही थी ।

मानो कल की बात है, जब बाबुल घर छोङ आयी थी,
तिनका-तिनका जोड़-बटोर, अपनी गृहस्थी बसाई थी ।
लाख समझाया गांववालों ने भोला अब न आएगा,
कर ले दूसरा ब्याह पगली समय बीत जायेगा।

हर आहट पर चौंकती, किवाड़ को ताकती कमली,
चौराहे पर भोला-भोला नाम पुकारती कमली ।
झोपडी में खूँटी पे टंगे कैलेंडर पर तारीख बदलती रही,
बूढी कमली टकटकी लगाए भोला की राह तकती रही ।

4 Comments

  1. subash 17/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 18/07/2020
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/07/2020
    • Garima Mishra Garima Mishra 29/07/2020

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