“मैं निशा हूं”

मैं निशा हूं

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सोचा कि आज कह ही दूं सबकुछ।

निर्दोष हूं, अकेली हूं, प्यारी भी हूं सचमुच।

मेरी तन्हाई को सिर्फ वहीं समझ सकता है-
जिसने आविरक्त प्रेम में अपने को खोया है,
जिम्मेवारियों का बोझ जिसने दिन रात ढोया है,
लक्ष्य को पाने के लिए जो अनवरत रातें नहीं सोया है।

काली कलूठी निशा हूं मैं,
मैंने भी उस चांद से प्यार किया है।
जिसे चांदनियों के एकतरफा प्रेम ने अपना बना लिया है।

चांद ने भी केवल मुझसे ही प्यार किया है
रौनक तो उसकी मुझसे ही है ना,
भला इन चांदनियों ने उसे दिया ही क्या है!

मेरे सघन तम से मैंने मानवों को चकित होते देखा है।
मानवी आकांक्षाओं में, मैंने अक्सर ख़ुद को कलंकित होते देखा है।

खमोशी से भरी,
गुनाहों की गवाह हूं मै।
प्रखर तेज़ सौर प्रकोप से मनावो की परवाह हूं मैं।
भोगी मन, कपटी मस्तिष्क व अभिलाषियों की अस्थिर चाह हूं मैं।

मेरी ही गोद में अनगिनत महान दिनों ने जन्म लिए है।
मेरी ही बाहों में दर्द भरे जीवन ने अंतिम सांस लिए है।

कपटी, लालची, दुष्ट प्रवृत्ति के कारण मुझे कुख्यात किया गया है।
काम इन इंसानों के है बुरे,
मुझे बेवजह बदनाम किया गया है।

मै रात हूं – समय द्वारा दी गई सबसे बड़ी सौगात हूं।
मै रजनी हूं – उषा की जननी हूं।

हां, मै काली कलुठी निशा हूं!

– हंसराज केरेकार ‘ राजहंस


2 Comments

  1. vijaykr811 01/07/2020
  2. डी. के. निवातिया 06/07/2020

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