कुण्डलिया छंद – डी के निवातिया

कुण्डलिया छंद
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मात  दात्री जन्म की , पिता जीव आधार।
धरा  गगन के  मेल से, अदभुत  ये संसार।।
अदभुत ये संसार, गजब कुदरत की माया।
पल में बदले हाल, कभी धूप कभी छाया।।
कहत ‘धरम’ कविराय, बना ये अटूट नाता।
पूजनीय दो धाम,  पिता देव,  देवी माता ।।
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स्वरचित : डी के निवातिया

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