कोरोना तेरे कारण

कोरोना तेरे कारणदरवाजे खुले हैं मगर अंदर कोई नहीं आताचाँदनी रात में चाँद देखने कोई नहीं आता।अब तो फूलों में दुबककर महक रह जाती हैअब तो काँटों की छुअन भी चुभन बन जाती हैअब परिन्दों की चहक चीखती नजर आती हैअब तो कोयल की कूक उदास नजर आती हैइस अतुल सृष्टि का सृजन देखने कोई नहीं आताकोरोना तेरे कारणदरवाजे खुले हैं मगर अंदर कोई नहीं आताचाँदनी रात में चाँद देखने कोई नहीं आता।अब शबनमी बूँदें पंखुड़ियाँ जला देती हैंअब बीरबहुटी दूब से नजर हटा लेती हैभ्रमरों की गुंजन में कलियाँ झूमती नहीं हैंमहकती हवा में तितलियाँ तक उड़ती नहीं हैंकिसे अब आवाज दें मित्र बनने कोई नहीं आताकोरोना तेरे कारणदरवाजे खुले हैं मगर अंदर कोई नहीं आताचाँदनी रात में चाँद देखने कोई नहीं आता।इस वीराने में अकेला कब तक कोई रहेरोककर साँस भी बेचारा कब तक कोई चलेलजाती हुई कहीं सेज भी अब सजती नहीं हैमुस्कराहट तक आंगन में अब खिलती नहीं हैजिन्दगी की निशानी तक ढूँढ़ने कोई नहीं आताकोरोना तेरे कारणदरवाजे खुले हैं मगर अंदर कोई नहीं आताचाँदनी रात में चाँद देखने कोई नहीं आता।अब पद पद पर मखमली राहें दिखती नहीं हैंमाथे लगाने लायक माटी मिलती नहीं हैअब मजार पर भी चादर चढ़ाई नहीं जातीबेकफन लाश की भी लाज बचाई नहीं जातीअब फूल भी अर्थी पर चढ़ाने कोई नहीं आताकोरोना तेरे कारणदरवाजे खुले हैं मगर अंदर कोई नहीं आताचाँदनी रात में चाँद देखने कोई नहीं आता।….. भूपेप्द्र कुमार दवे00000

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