और भी सितम ढ्हाने को जी चाहता है

वक़्त का मंजर बहते बहते किस लम्हे थम सा जाय,हर शख्स का एक वक़्त होता है, वह हमारा वक़्त नहीं था,पर इसका ये मतलब नहीं की वो वक़्त, वक़्त नहीं था…ए जिंदगी तु साथ होकर भी साथ नहीं होती,अब तो राहत मे भी राहत नहीं होती,हम सैकड़ों जनम लेते है,कभी पती पत्नी बनकर,कभी प्रेमी बनकर्, तो कभी अनजाने बनकर,लेकिन मिलते जरूर है आखिर मे,नहीं मिले तो कहानी खत्म कैसे होगी, इसे जिंदगानी कहते है,नवाजिश, कर्म, शुक्रिया, मेहरबानी…… मुझे बक्श दिया आपने जिंदगानी,दुनिया का सितम याद, ना अपनी ही वफ़ा याद……अब कुछ भी नहीं मुझको मोहब्बत के सिवाह याद,बेखबर सोये है वो लूट के नीन्दे मेरी,जज्बा-ए – दिल पे तरस खाने को जी चाहता है…….कबसे खामोश हुए हो जाने जहान कुछ बोलो….क्या अभी और भी सितम ढ्हाने को जी चाहता है…••••••••••गौरव ललवानी••••••••••••

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