रंग-ए-रंज-ए-रूह

तेरे जाने का सबब जो हो सो होतेरे आने का सबब लाख बहोत अच्छा था

वो हमसे वफादारी निभाई न गयीमगर ये कोशिश-ए-गुस्ताख़ बहोत अच्छा था

हमने भी देखें हैं बदलते मौसमवो फ़िक्र-ए-नौबहार यार बहोत अच्छा था

बहोत अच्छे थे हम जो थे न कोईकिसीका होके वो ख़ुमार बहोत अच्छा था

ज़ख्म है लाल ज्यूँ के हो बादाजो देता चिर कलेजा तो बहोत अच्छा था

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