ललकार

लाचारगी की बेड़ियों को तोड़ जो न पायेगातनहा किसी कोठरी में खुद को टूटा पायेगा

कब तलक तू दिल को अपने धोके से सहलायेगारोयेगा तू पर ना तुझपे कोई रोने आएगा

बुज़दिली का चोला पहने आह भरता जायेगासिलसिला ये ज़ुल्म का बेज़ब्त चलता जायेगा

वलवले ना दिल में हो मज़लूम ही कहलायेगामजबूर होकेअपने हाल पे यूँहीं झुँझलायेगा

जब तक न खौले खून फ़क़त खून बहता जायेगाजब तक न टपके माथे से माथा झुका रह जायेगा

मांगने से भीख आज़ादी कभी मिलती नहींरुख हवा का गिड़गिड़ाने से बदलती भी नहीं

खौफ किसका, क्यों झिझकना, पीछे अब हटना नहींबढ़ते जो कदम हैं उन्हें चूमती मंज़िल कहीं

वो नहीं बलवान जिसका सबसे है सीना बड़ाहै अज़ीम जो मौत के है सामने निडर खड़ा

जान ले के जान देने की घड़ी अब आयी हैठान ले कुछ कर गुज़रने की घड़ी अब आयी है

बाँधके सर पे कफ़न, इक अहद सीने में लिएअब जो टूटो तो ज़ुलम पे हाथ में हसिया लिए

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