समूल लौटेगा

मासूम हथिनी का उदर जलाकर क्या मिला तुझे उसे मौत खिलाकरजल से भी जो ना बुझ पाई कैसे सोया होगा तू ये आग लगाकरनादान थी जो भरोसा कर गयी एक निवाले के लिए ही मर गयी पर मर गयी मानवता भी यहाँ बदनुमा दाग तेरे नाम कर गयी दया धर्म जहाँ का मूल हो सारा विश्व कुटुम्ब स्थूल होकैसे देखेगा देश ये वज्रपात कैसे सहेगा जो प्रतिकूल हो मानव मन की वेदना मार लो अब वक्त है खुद को सुधार लो बनकर समूल लौटेगा चाहे तुम कितना भी उधार लोस्वरचित एव मौलिक रचना राकेश कुमार महेन्द्रगढ,हरियाणा

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