हूँ मज़दूर मैं भारत का

घर जाने की कीमत अपनीमैं लाशों से चुकाता हूँहूँ मज़दूर मैं भारत काअपने घर को जाता हूं।दो रोटी की भूख को अपनीमैं गमछे से दबाता हूँबिन चप्पल ओर भूखा प्यासाअब बस चलता जाता हूँ।हूँ मज़दूर मैं भारत काअपने घर को जाता हूं।।अपने पैरों के छालों परमरहम-ए-उम्मीद लगाता हूँभुढे माँ बाप से मिलने मैंघर अपने अब जाता हूँ।हूँ मज़दूर मैं भारत काअपने घर को जाता हूं।।खुशकिस्मत कई आए प्लेन सेमोटरगाड़ी से कई आते हैबदकिस्मत हूँ मैं इतना किपैरों पर रोका जाता हूँ।हूँ मज़दूर मैं भारत काअपने घर को जाता हूं।।अपने हाथों से तो मैंनेसपने तुम्हारे खड़े किएपर अपनो से मिल लेने कोमीलों हज़ार मैं जाता हूँ।हूँ मज़दूर मैं भारत काअपने घर को जाता हूं।।फिक्र नही एक कोड़ी कीसरकार हो चाहे जनता होदेख रहे घृणा से सारेजैसे के मैं ही कोरोना हूँहो मायूस मैं इस शहर सेगाली खाते जाता हूँहूँ मज़दूर मैं भारत काअपने घर को जाता हूं।।घर जाने की कीमत अपनीमैं लाशों से चुकाता हूँहूँ मज़दूर मैं भारत काअपने घर को जाता हूं।।―Shayar Ekaant 

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