गजल

दिनांक- 11 जून 2020 वार- गुरुवार विषय- बहार विधा- गजलएक तू जो आ जाये तो करार आ जाये इन सूनी फिजाओं में बहार आ जाये जितनी भी काटी है सब बेमतलबी काटी यूँ घुटती जिंदगी में फिर बयार आ जायेबड़ी मायूस सी हो गई डगर मंजिल कीएक तू लौट आये तो त्यौहार आ जाये आज भी ढूँढती हैं झरोखे में तुझे आँखेंपलटती नजरों को भी दीदार आ जाये करने से रुसवा कुछ हासिल नहीं होगा दिल तलाशेगा तब तक सरकार आ जाये स्वरचित एव मौलिक राकेश कुमार महेंद्रगढ़ हरियाणा

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