अपने ही घर में बेगाना हूँ – डी के निवातिया

अपने ही घर में बेगाना हूँ,
हालत पर अपनी बेचारा हूँ ।।

मैं सबका सब मेरे है फिर भी,
अपनों के बीच अनजाना हूँ,।।

कहने को है सारा शहर मेरा,
मुर्दो की भीड़ में वीराना हूँ ।।

पक्की दीवारों के इस खंडर को,
देख देख कर मैं अब हारा हूं ।।

जुस्तजू में निकला था जिसकी,
उसकी मुहब्बत का मैं मारा हूँ ।।

मिलेगा इक दिन मुझको यकीं है,
वो चाँद मेरा मैं उसका तारा हूँ।।

शिकवा करना फ़िजूल है यारा,
“धर्म” कहे अधर्म का मारा हूँ।।
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स्वरचित मौलिक – डी के निवातिया

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2 Comments

  1. vijaykr811 09/06/2020
    • डी. के. निवातिया 22/06/2020

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