वो जानता ही नहीं

विधा गजलदोहा गजलकाफिया आ स्वर रदीफ़ ही नहीं बहुत नादान है ये दिल किसी की मानता ही नहीं कौन है दुश्मनों में शामिल ये पहचानता ही नहीं पालता रहा उम्मीदें मैं पत्थर दिल वालों से बदल गया वो शख्स जैसे की जानता ही नहीं जला रहे हैं आज देखो वो मकान मेरे इरादों के उनके लिए मैं जीता था कोई मानता ही नहीं मिटाकर सबूत जख्मों के मेरे वो हँशता रहता है गुनाहगार होकर भी सजा वो जानता ही नहीं बहुत हुआ खेल ये अब मेरी आजमाइश का मैं इरादों से ऊँचा हूँ शायद वो जानता ही नहीं राकेश कुमार महेन्द्रगढ,हरियाणा

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  1. vijaykr811 vijaykr811 09/06/2020
  2. rakesh kumar Rakesh Kumar 03/07/2020

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