माँ के आँसू की गरिमा …. भूपेंद्र कुमार दवे

माँ के आँसू की गरिमा सबकी आँखें गीली करताजीवन है आँसू की गाथामोती जैसे आँसू चुनकररचता है पीड़ा की माला। सिसक सिसक कर पीड़ित मन भीव्याकुल रहता है हर इक पल।पर दुख चुभता ही रहता हैअश्रूधार भी रह जाती विफल आँसू से गर पीड़ा मिटतीमैं भी सावन भादों-सा रोताखुद की पीड़ा मिट जाने परसबकी पीड़ा भी हर लाता। तू नितनव पीड़ा रचता तोमैं नव आँसू रचता जातापीड़ा सबकी हरते हरतेसबका प्यारा बन जाता। तब मैं नन्हा बालक बनकरतेरी आँखों में छिप जातामुझे ढूँढ़ता तू भी रोतामेरी माँ के सम्मुख आता। तेरे आँसू में मुझे देखमाँ का आँसू इठला जाताचूम चूमकर तेरी पलकेंममता का भी दिल भर जाता। तेरे आँसू देख देखकरमाँ की आँखें भी नम होतीमंदिर में तेरी मूरत भीतप्त अश्रू से लथपथ होती। क्यूँ रोता है ईश हमारा?किन दुष्टों ने की है ठिटोली?’इसी सोच में कुपित हुई तबमंदिर में भक्तों की टोली। तेरे सम्मुख मुझे देखकरकोलाहल-सा है मच जातादोष मुझे तब सब देने लगतेप्रभू को यही है तड़पाता। ले चलो इसे अभी पकड़करमाँ से इसको सजा दिलानेदुखहर्ता को दुख देने कीकड़ी से कड़ी सजा दिलाने। मुझे बचाने माँ तब बोलीयह बच्चा भोला-भाला हैमैं ही मंदिर गई हुई थीअर्पित करने अपनी माला। तब मूरत से बहता आँसूमेरे आँचल पे गिर आयाशायद इस आँसू ने मुझमेंदीप जलाया था आशा का। तुम  देखो मंदिर में जाकरआँसू से तर मेरी मालापुष्पों में जिसके अंदर हैभक्तिभाव की निर्मल आभा। सुनकर माँ के मधुर विनय कोसब जन नतमस्तक हुए तभीछूकर माँ के चरण कमल तबआसीस लिये चल पड़े सभी। पास खड़ा मैं देख रहा थामाँ के आँसू की गरिमा।सबके आँसू झरझर बहतेगाते थे आँसू की महिमा।…. भूपेंद्र कुमार दवे00000

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2 Comments

  1. shantanujumde 27/05/2020
  2. डी. के. निवातिया 30/05/2020

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