अभी भी कसर है – शिशिर मधुकर

यूं ही नहीं हम परेशां ये सब तुम्हारा असर है मिलना मिलाना हुआ है लेकिन अभी भी कसर है तुम दूर बैठे हो छुप के आते नहीं सामने अब भले भीड़ चारो तरफ हो सूना लगे सब शहर है चलने को तुम चल रहे हो हम भी सफर में हैं हरदम लेकिन बड़ी मुद्दतों से मिलती ना कोई डगर है जिसने मुहब्बत की कसमें मर के भी हरदम निभाईं यहां नाम उस आदमी का होता रहा बस अमर है मिट्टी का है साथ उसपे शाखों की रंगत तो देखो मधुकर तभी तो हमेशा रहता हरा ये शजर है शिशिर मधुकर

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