मैं क्या हूँ ? { श्रमिक वर्ग की वेदना }

दिखने में तो इंसान हूँ ,मगर क्या वास्तव में इंसान हूँ ?न दिल अपना ,न दिमाग अपना ,जो जिधर कहे वहीं चला जाता हूँ ।कभी गाँव से शहर की ओर ,तो कभी शहर से गाँव की ओर ,किसकी डोरी से खींचा चला आता हूँ ?मेरा निजी स्वार्थ या मेरी मजबूरी ,चंद सिक्कों के इर्द गिर्द घूमती है मेरी धूरी ।मेरा जीवन खुद मेरा नहीं,मेरा कोई स्वाभिमान भी है !स्वाभिमान किस चिड़िया का नाम है ?मैं कुछ भी जानता नहीं।जिम्मेदारिओं का बोझ कुछ सोचने नहीं देता ,साहब !मौत का भय भी मुझे मत दिखाओ ,मैं कफन बांधकर जीता हूँ।महामारी मुझे क्या मारेगी ,उससे पूर्व तो इस पापी पेट की आग ,यह भूख ही मुझे मार देगी ।मेरे लिए तो एक ओर खाई ,दूसरी ओर कुंआ ,मैं तो दोनों ओर से मरता हूँ ।कहने को तो कड़वी लगेगी मगर है यह सच्चाई ,मैं कोई देश का भाग्य विधाता नहीं,मैं एक बेबस ,लाचार मजदूर हूँ,राजनीति के खेल का मोहरा और ,अपने मालिक के हाथ की कठपुतली हूँ।इसके सिवा अब तुम्ही बता दो ,मैं क्या हूँ ?    

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