चाय:-विजय

चाय न हो, जैसे हो अमृतकारण क्लेश घर की ये होतीजो न सुबह उठते ये मिलतीशुरू होती “भजन और भक्ति”घर जो पधारे देव अतिथिचाय से ही पूजा है होतीजो न परोसा चाय है आगेघर-घर बुराई खूब है होतीपीछे इसके नर हो या नारीहो बूढ़े या जवान की जातिलत में सब ऐसे है पागलदारू से भी यह बड़ी बीमारीबिना चाय बुद्धि न खुलतीकितनो की तो शौच न होतीचाय कुछ की है शादी करवातीकारण इसके गठबंधन टूट जातीचाय पर सरकार है बनतीजोड़-तोड़ की राजनीति होतीचाय तो एक मीठा जहर हैतिल-तिल कर प्राण ये हरती

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