जोश नहीं खामोश

मंच को सादर नमन शीर्षक -जोश नहीं खामोश सर्दी ,गर्मी ,भूख प्यासमुस्कुराकर झेल जाते हैं तुम गाते जो देश के नारे वो उस पर मिट जाते हैंमांस और खून आज भीजमा हैं उन पहाड़ियों परदो ईंटे गुमनाम लगी हैंइन मौत के खिलाड़ियों परपीतल के तमगों से हममान उनका बढ़ा रहे हैंजो काटकर गर्दन अपनीमाँ भारती को चढ़ा रहे हैंउनकी लिखी चिट्ठीबक्से में धरी रह जाती हैये सरहदी आग जाने कितने घर जलाती हैतहस नहस हो गई जिंदगीउसके बच्चे मासूम कीकौन कमी पूरी करेगाबिछुड़े बाप मरहूम कीरक्तभरा बदन माँ भी सीने पर सह लेती हैपर जोश नहीं खामोश जय हिंद कह देती है राकेश कुमार महेन्द्रगढ, हरियाणा

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