किसान, खेती और राजनीति

हम रहते हरदम चर्चा में
शासन सत्ता के पर्चा में
भारत का लाल समझते हैं
वो ख्याल हमारा रखते हैं।
सदियां बदली बदले मौसम
युग बदला पर न बदले हम
तुम आग लगाने वाले हो
हम आग बुझाने वाले हैं।

खेती करना अभिशाप नही
यह कर्म कोई परिहास नही
श्रम का उत्तम निष्पादन है
यह संस्कृति का संसाधन है।
यह जीवन है संघर्षों का
यह उदगम है उत्कर्षो का
तुम भूख बढ़ाने वाले हो
हम अन्न उगाने वाले हैं।

प्रकृति प्रदत्त प्रणव पंकज
जल को कर देता है प्रांजल।
वसुधा का मान बढ़ाता है
जब जब चलता खेतों में हल।
मिट्टी से सारा नाता है
मिट्टी ही अपनी माता है।
तुम मरुथल के मतवाले हो
हम भू उपजाने वाले हैं।

माना कि खाली झोली है
मधुमय मृदु फिर भी बोली है।
सीधे सच्चे हृदयों में बस
स्नेह सुमन रंगोली है।
मैल नही कोई मन मे
रहते हैं ऐसे उपवन में।
तुम द्वेष कपट के जाले हो
हम करुणा के रखवाले हैं।

स्वप्न शहर का बेहद सुंदर
लेकिन बर्बादी का मंजर
गांव दिखे हैं उजड़े उजड़े
खेत हुआ जाता है बंजर।
शहरों की ये सौदेबाजी
गांव की घटती आबादी
तुम शहर सजाने वाले हो
हम गांव बचाने वाले हैं।

खेती को व्यापार न समझो
दुनिया का बाजार न समझो
शहर को अपने सीमित रखों
गांवों पर अधिकार न समझो
भूख गरीबी का दिन होगा
इक दिन ऐसा मातम होगा।
तुम पथ भटकाने वाले हो
हम राह दिखाने वाले हैं।

गांव को गांव बना रहने दो
कृषक सुजान सदा रहने दो
गांव में शहर में ढल न जायें
इतना फर्क बना रहने दो।
कृषक देव हैं वसुंधरा के
सत्य सरल है सर्वथा से।
तुम सत्य छुपाने वाले हो
हम सत्य बताने वाले हैं।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

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