Roti ki talash

रोटी की तलाश में……मैं घर से निकला था एक आस में,मिटाने को तलब पापी पेट की,मैं निकला था रोटी की तलाश में।मैं मज़दूर हूँ,सर्जनकार हूँ, मैं ही बड़ी -बड़ी इमारतों का रचनाकार हूँ।आलीशान ,जगमगाते इन कंगूरो कीअनदेखी नींव का मैं आकार हूँ।।आशाओं ओर उम्मीदों का बोझा लेकर निकला था मैं अपने गाँव से,चार पैसे को चाह में,मैं निकला था परदेश की राह में,मैं निकला था रोटी की तलाश में।क़ुदरत ने ऐसा तमाचा है मारा,नहीं रहा इस अजनबी शहर में कोई छत ना सहारा।एक-एक ने क्या ख़ूब अपना रंग दिखाया,मालिक ने चंद पैसे देकर नौकरी से भगाया।इस शहर में अब पड़ रहे है खाने के भी लाले,घर जाती सड़क पर चल-चल कर पड़ गए है मेरे पैरों में छालें,रोतीं आँखे मेरी माँ की मुझे बुला रही हैं,घर जाने को जान मेरी भी जा रही हैं।मगर डर मुझे बहुत है,कहीं किसी रास्ते में ,मैं कुचला जाऊँगा,तो कभी किसी रेल से मसला जाऊँगा।कहीं बन ना जाऊँ राजनीति का पियादा,कहीं दिखावटी लोग ना उठाये मेरी लाचारी का फ़ायदा ।रोटी की तलाश में,मैं निकला था अपने गाँव से,हार के नहीं,हताश हो कर जा रहा हूँ,परदेश की ये स्वार्थी दुनिया छोड़ ,पाने अपने स्वाभिमान कोमैं अपने गाँव जा रहा हूँ,रोटी को तलाश में , कभी ना शहर लौट आने के दृढ़ विश्वास में,अपने देश ,अपने गाँव जा रहा हूँ।इस बार रोटी की तलाश में अपने गाँव जा रहा हूँ।।रचनाकारपूजा जोशी

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