मजदूर और मजबूर दोनों हूँ…मैं।

याद है वो दिन जब तुम अपनी भीड़ के साथ हमारी चौखट पर आए थे,वादें जो भी किये उस रोज़, हमें अब भी सारा कुछ याद है।चलो माना बिजली,पानी और सड़कें होते होंगें चुनावी जुमले कोई,पर तुमने हमारी भूख को नज़र-अंदाज़ किया, हमें तो बस इसका मलाल है।हमें फिर भी तुम्हारे इन सब ढोंगों की अब आदत सी हो गयी है,लेकिन पूरे रस्ते अपने बच्चों को कैसे समझाया है, हमें अब भी सारा कुछ याद है।सुना था हमने सियासत में वादाख़िलाफी और अनदेखी बहुत आम बात होती है,पर मुश्किल इस घड़ी में, तुम हमें इस क़दर भूल जाओगे, क्या यहीं तुम्हारा ईमान है।रास्ते भर हम यहीं सोचते रहे कि काश! ये बीमारी चुनावों के वक़्त आयी होती,नहीं देखने पड़ते ये दिन, पक्का तब तुम कुछ करते, ऐसा हमारा अटूट विश्वास है।तपती सड़कों पर हां, वो सारे आते थे मिलने हमसे लेकर एक कैमरा और बड़ी सी कुछ गाड़ियां,उनके सवालों ने अहसास दिलाया कि ये बेचारे किसी टीआरपी नाम की मजबूरी के मोहताज़ है।तुम्हें शायद इसकी भी ख़बर नहीं होगी। चलो, हम तुम्हें बता देते है,जिन बस्तियों से हम गुजर कर आये है, वहाँ बहुतों का बहुत बुरा हाल है।और जिसे तुम अपने बड़े बड़े दावों में बकते रहते हो ना,पता चल गया हमें, वो सब महज़ जुमलेबाजी और कोरी बकवास है।और सुनो! अगली बार जब तुम हमारे घरों पे वोटों की भीख़ मांगने आओगे ना,ले आना एक कटोरा भी साथ में, इससे ज़्यादा नहीं तुम्हारी कोई औक़ात है।अब भी वक़्त रहते बाज आ जाओ अपनी इस दोगली मक्कारी से,याद रखना तुम्हारी सारी करतूतों का हमारे पास एक-एक हिसाब है।__©✍️अब्दुल्लाह क़ुरैशी

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