प्रवासी:-विजय

कदम बाहर रखने को भला
दिल किसका कब चाहता है
अपनो की खातिर लोगों का
परदेस भी घर बन जाता है

दो बात किसी का सुनने को
दिल किसका कब चाहता है
अपनो के खातिर दूसरों का
गाली भी दुआ बन जाता है

कतरा – कतरा खून बहाना
दिल किसका कब चाहता है
अपनो के खातिर खून को भी
पानी की तरह बहाना पड़ जाता है

रात-दिन जागने को भला
दिल किसका कब चाहता है
अपनो के खातिर नींद को भी
दफन आंखों में करना पड़ जाता है

4 Comments

  1. naim 09/06/2020
    • vijaykr811 vijaykr811 10/06/2020
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/06/2020
    • vijaykr811 vijaykr811 10/06/2020

Leave a Reply