मज़दूर

कल तक हाथों में जो छाले थे।बो पहुँच गए है पांव तक।मत रोको उनको जाने दो ।उन्हें जाना है अपने गांव तक।सदियों से जिसने शहर सबारे।बो फिरे है धूप में मारे-मारे।शहर में भूख की गर्मी है।उन्हें जाने दो छांव तक।है शहर आज बेगाने हुए।बहुत इनसे थे वादे हुए।मजदुर क्यों इतने मजबुर हुए।क्या ये सीमित है राजनतिक दाव तक।जो सड़कें पसीने से सिंची थी।आज लहू भी उन में मिल गया।इन्हें करना है पार बेबसी का दरिया।जाने दो इनको नाव तक।सफ़र लम्बा है गोद में बच्चे।आंख में आंसू है सिर पे बोझे।अभी तो मीलो चलना है।जाना है आखरी पड़ाव तक।हज़ारों काफ़िले मंज़िल एक।रोते बच्चों का सवाल एक।मां घर कब आएगा हंस कह दिया थोड़ी दूर।छुपा दिए अपने घाव तक।ये देश के पतवार है।फिर क्यों इतने लाचार है।बनाए कई महल मगर।नहीं रहने कोई ठाव तक।

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