घर तक का सफ़र,,

सादर नमन मंचविषय : आलेखशीर्षक -घर तक का सफ़र,,कोरोना के प्रकोप ने एक नहीं अनेक चुनौतियाँ मनुष्य के समक्ष रखी हैं जिसमें मजदूर पलायन भी एक है | यह कहना बहुत आसान है कि जो जहाँ है वही रहे, लेकिन कोई नहीं सोच सकता कि एक व्यक्ति दिल्ली से चलकर ग्वालियर तक पैदल किस हिम्मत से पहुँच पाया और दुर्घटना के उपरांत उसकी पत्नी के शब्द ‘ बच्चों के लिए उठ जाइये ऐसे छोड़कर मत जाइये ” कितने हृदय विदारक हैं |प्रशासन के द्वारा दी गई प्रताड़ना एवं पशुओं की तरह एक स्थान से दूसरे स्थान तक हांक दिया जाना किसी से छिपा नहीं है | छोटे-छोटे बच्चों के जलते हुऐ पाँव, भूख से मुरझाते हुऐ चेहरे और अपने घर पहुँचने की आस लिए घुटनों पर सिर टिकाये युवा बहुत से सवाल खड़े करते हैं उनके लिए जो समाज के रहनूमा बने बैठे हैं | आज यह बात सत्य सिद्ध हुई कि गरीब का कोई नहीं होता| किसी ने सहारा भी दिया और किसी ने मौत भी | क्या शासन और प्रशासनिक विभाग केवल अजगर की तरह सोने के लिए होता जिसकी नींद बहुत से लोगों की मौत होने पर ही खुलती है| क्या कोई सोच सकता है कि किसी दिन खुद का घर इतनी दूर हो जाऐगा, बहुत दूर |सादर नमन राकेश कुमार

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