मजदूर:-विजय

जिंदगी की जद्दोजहद में
हालात ये कैसे बने है
भूख जो ले आयी थी शहर
वही भूख घर ले चले है

पैरों में छाले की न है चिंता
पैदल मीलों सब चल पड़े है
अपने हाथों से खड़ा किया जो
वही शहर अब गैर बन पड़े है

भ्रम टूटा है अब सबका
अपना जिनको समझे हुए है
हकदार क्या हम थे ऐसे
लौटने को जैसे मजबूर हुए है

मार पड़ी है दोहरी
घर रोजगार सब छीन गए है
बची हुई सांसे समेटकर
जन्मभूमि की ओर चल दिए है

जानवर भी बेहतर हमसे
स्वछंद जो घूम रहे है
पापी पेट के खातिर हम
बैल बन गाड़ी खुद खींच रहे है

सुध न किसी को मेरी
दर-दर हम भटक रहे है
मजबूर है सब साहब
इसलिए मजदूर सब सह रहे है

2 Comments

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 09/06/2020
    • vijaykr811 vijaykr811 10/06/2020

Leave a Reply