जिज्ञासा

मै बहुत कुछ लिखकर भूल जाना चाहती हु,कुछ सच,कुछ झूठे इस जमाने से मुकरना चाहती हु।है मेरी ख्वाहिश जैसे कुछ पागलो जैसेखुद से खुद में गुजर जाना चाहती हु..क्या लडू वक्त से कुछ समझ नही आता,गिला कुछ भी नही,बस ठोकर खाकर कुछ सीख जाना चाहती हूं..ख्वाब भले ही न पुरे हो कभी..फिर भी इन्हें बेहिसाब देखना चाहती हु।मैं बहुत कुछ लिखकर भूल जाना चाहती हूँ।कुछ यूं मिलाकर नज़र खुद से, एक बार सबकुछ नज़रअदांज करना चाहती हूं।। वक्त गुजरता चला जाये यों हीं…..बस माँ के आँचल में सिमटी रहना चाहती हूं।।मै बहुत कुछ लिखकर भूल जाना चाहती हूं।। सही क्या है, और सही कौन है़…उलझी इस कहानी को,एक बार सुलझाना चाहती हूं।मै बहुत कुछ लिखकर भूल जाना चाहती हूं।                                 भूल जाना चाहती हूं…                                          ✍️✍️…Anjali                                                 7/05/2020

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