श्रीराम:-विजय

पितृ-प्रण का मान रखने
समय आया निभाने को
सहज भाव स्वीकार किए
वन में चौदह वर्ष बिताने को

चेहरे पर मुस्कान लिए
माँ से ऐसे कह रहे
बात कोई बड़ी न जैसे
बात हास्य के कह रहे

प्रण पिता के पूरे करने
वन को ऐसे चल दिये
दण्ड न मिला हो उनको
भ्रमण को है जैसे चल दिए

सारी नगरी रोकती
अपने राजा राम को
प्रण धारण वो कर चुके
छोड़ चले निज धाम को

संगिनी संग भ्रात लक्ष्मण
वर्ष चौदह बिताए वनवास को
कार्य सिद्ध देवों के किये
रावण के हर लिए प्राण वो

सीता की ली अग्नि-परीक्षा
मन ही मन खुद जलते रहे
सीता तो कुंदन बन निकली
दोष राम पर ही लग गए

त्याग दिए सब सुखों को
अपनी प्रजा के सुख लिए
प्राण से भी प्रिय प्रिया को
वन में अकेला छोड़ दिए

रामराज में प्रजा जन
सुखी और संपन्न रहे
राम सिया वियोग में रह
भूमि पर ही सोते रहे

धर्म-पथ चले वो जिसपर
जन-जन को वो बतला गए
सारे जन को ताड कर
जल विलीन वो हो गए

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 13/07/2020
    • vijaykr811 vijaykr811 13/07/2020

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