विद्रोह नही कर सकता हूँ।

आदेशों के पालन में अवरोध नही बन सकता हूँ
मैं सेना का नायक हूँ विद्रोह नही कर सकता हूँ।
हे जनमानस हे जग पालक
हे सत्ता के दृढ़ निर्वाचक
आंखे खोलो जागो देखो
क्या परिदृश्य नजर आता है
भूख गरीबी और कपट में
लिपटा देश नजर आता है।
तुम जैसी हुंकार गर्जना घोर नही कर सकता हूँ
मैं सेना का नायक हूँ विद्रोह नही कर सकता हूँ।

बेंच रहे हैं घर के मालिक
अपने घर की चौखट को।
पानी के रखवाले जैसे
रौंद रहें हो पनघट को।
बात शांति की करते हैं
लेकिन लाते दहशत को।
संरक्षक बन सत्ता का प्रतिरोध नही कर सकता हूँ
में सेना का नायक हूँ विद्रोह नही कर सकता हूँ।

सेवा करना परम धर्म है
बचपन से सिखलाया है
पर न जाने क्यों सेवा को
अब व्यापार बनाया है।
नैतिकता के प्रांगण में
परचम तम का लहराया है।
फिर भी दीपक बनकर सकल अजोर नही कर सकता हूँ
में सेना का नायक हूँ विद्रोह नही कर सकता हूँ।

मजदूरों का काम छिन रहा
नही फसल का दाम मिल रहा।
कृषक सोच में व्याकुल बैठे
नही कहीं आराम मिल रहा।
नौकरियों पर आफत आई
ये कैसा अभियान चल रहा।
ऐसे अभियानों पर गहरी चोट नही सकता हूँ
मैं सेना का नायक हूँ विद्रोह नही कर सकता हूँ।

निजीकरण में निजता का
कोई सम्मान नही होगा
मानवता की प्रभुता का
कोई प्रतिमान नही होगा
एक धर्म सौदेबाजी का
दूजा नाम नही होगा।
समझो मेरी बातों को कुछ और नही कह सकता हूँ
मैं सेना का नायक हूँ विद्रोह नही कर सकता हूँ।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा’विनीत’

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 16/05/2020
  2. Dr.M.C. Gupta 17/05/2020
  3. kiran kapur gulati 08/06/2020

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