यात्रा लाॅकडाउन की

लाॅकडाउन की दीर्घ यात्रा मेंखुलने लगे हैंजीवन के अनछुए दरीचे !

शोर की जगहमौन हो गया है प्रखर!सुनाई देने लगे हैंचिड़ियों के गीत!दिल की सदाएं भीहो गयी हैं रूबरू!

प्रकृति सज गयी हैनयी नवेली दुलहन की तरहउसका यहकोरा, अप्रतिम रूपजैसे कोई स्वप्न लोक!

रिश्ते सब बदले बदले सेलगने लगे हैं!कुछ धुंधले हो गये,कुछ शफ्फाक!

जीवन कीनश्वरता के बोध मेंबजने लगा हैक्षणिकता का मधुर संगीत !छोटी छोटी वस्तुओं के भीदीखने लगे हैं मायने!

मैं हूँ, प्रकृति है, समष्टि हैयही है जीवन का सार!मुझसे परे और मुझसे इतर भी हैविधाता का एक खूबसूरत संसार!

© डॉ. कृष्णगोपाल शर्मा

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